मुसाफिर

जुलाई 27, 2008

बबुआ पूछेला सवाल

Filed under: न रदीफ न काफिया न पाब — dipankargiri @ 4:19 अपराह्न

मोट मोट अंखियन से पूछेला बबुआ हमार
कधिया ले धोये पड़ी होटल के गिलास

ई गिलसवा में छलकेला बचपन हमार
करलस के चोरी ऐ साथी सवनवा हमार

एको आंख सोहे न भोर कीरिनिया
सुरूजवा करेला जिनगी में हमरा अंधार

टुकुर अंखियन से ताकेली बचवन के
हमरो के सकूल चाही ऐ भाई डे‍स किताब

बड़का बुढ़वन खेलेला खेल कमाल
हमरा खेले पे लागल बा काहे घेरा हजार

हमरा मालिक के बचवन बा फूल गुलाब
हमरा माटी में काहे ना उगे फूल गुलाब

सड़किया किनारे सजल बा सुंदर बजार
फुटपाथ पर देख बचपन बिकाला हमार

केकरा से आस लगाई बताव सयान
कि जिनगी में कधिया ले आयी बिहान

मोट मोट अंखियन से पूछेला बबुआ हमार
कधिया ले धोये पड़ी होटल के गिलास

जुलाई 26, 2008

जो हाथ न उठा सके वे उंगलियां उठा बैठे

Filed under: न रदीफ न काफिया न पाब — dipankargiri @ 8:37 पूर्वाह्न

मुटठी भर राख निकली
तेरी यादों की एक रात से
कटघरे तक जा पहुंचे हम
बात निकली जब एक बात से

हम दोनो

Filed under: सफर की कविताएं — dipankargiri @ 8:00 पूर्वाह्न

उन संबंधों के नाम जो अब नहीं सताती

 

बिजली के खंभों की तरह
खड़े थे हम दोनो
दूर से एक दूसरे को देखते
और लोगों को लगता कि
बेज़ान हैं हम दोनो
इतने पास होकर भी
कभी गले न मिल पाये हम दोनो

तुमहें चाहिए था एक आइना
तुमहारी खूबसूरती के लिए
जबकि मैं भटकता रहा
महज एक बतॆन के लिए
रोटी और चांद की लड़ाई में
ऐसे गुम हुए हम  कि
गले न मिल पाये हम दोनो

मेरे पांव सरपट भागते थे
खेतों की मेंडों पर
जबकि तुमहें मोच आ जाती थी
उनहीं पगडंडियों पर
हाथ पकड़ कर साथ साथ
कहां तक चल पाते हम दोनो
गले न मिल पाये हम दोनो

मैं उस हवा को चूमना चाहता था
जो तुमहारे जुलफों को उड़ाती थी
तुम परेशान थी उनहीं झोंको से
और उसे मुटठी में कैद करना चाहती थी
हवा का शोर था इतना कि
सुन न पाये कुछ हम दोनो
गले न मिल पाये हम दोनो

तुमने बस इक बार जि़द की
और खिलौनों की तरह तुमहें मिला सूरज
मैं कितनी डालियां चढता रहा तब कहीं
नीम के दरखतों से छनकर मुझे मिला सूरज


था हमारे बीच ही कहीं सूरज
और भटकते रहे अंधेरे में हम दोनो

ठीक उसी वकत

Filed under: सफर की कविताएं — dipankargiri @ 6:44 पूर्वाह्न

अनु के लिए जो आज भी मुसकुराती होगी

 

ठीक उसी वकत
देखना चाहता हूं तुमहें ठीक उसी वकत
न आगे न पीछे ठीक उसी वकत
जब तुम होती हो न अपने पास न खुद से दूर
छिपकर देखना चाहता हूं तुमहें ठीक उसी वकत

उंगलियों से निशानी नापते
जब तुम घुमाती हो अपनी गले की चेन
चुपके चुपके जब पढ़ रही होती हो
अपने हाथ की लकीर
सुबह सुबह खिड़की खोलते ही जब ओढ़ लेती हो सूरज
देखना चाहता हूं तुमहें ठीक उसी वकत

कुछ बड़ी छोटी बूंदे जब
अचानक तुमहारी आंखों से टपक जाते हैं
डर जाती हो जब अपनी ही परछाई से अचानक
गिर पड़ता है चेहरे पर तुमहारे कोई बाल
काजल लगाते वकत अचानक
देखना चाहता हूं तुमहें ठीक उसी वकत

और कभी वैसा हुआ तो
जैसे अलमारी खोली हो तुमने
और अचानक से कोई पुराना खिलौना तुम पर आ गिरे
उफ नाराज़ हो रही होती हो या बस मुसकुरा देती हो
देखना चाहता हूं ठीक उसी वकत

बिसतर पर लेटी तुम
जब पढ़ रही होती हो पनने
और खो जाती हो रूपा के किरदार में
और अचानक से कालबेल की आवाज़ से
किस कदर सहम जाती हो तुम
देखना चाहता हूं तुमहें ठीक उसी वकत

गुनगुनाती हुई जब तुम काट रही होती हो सबिजयां
और अचानक से गुम हो जाती होगी बिजली
लुढकने लगते होंगे जब आलू पयाज किचन में
किस कदर बेबस हो जाती होगी तुम
देखना चाहता हूं तुमहें ठीक उसी वकत

बालकनी के सामने हिलती टहनी को
भूत समझ कर
आहिसता से जब तुम बंद करती होगी खिड़की
देखना चाहता हूं ठीक उसी वकत

उस तरह नहीं जैसे तुमहें सब देखते हैं
उस तरह भी नहीं जैसे तुम देखती हो
कोई नहीं देख रहा हो तुमहें
देखना चाहता हूं तुमहें ठीक उसी वकत

जुलाई 25, 2008

हवा के सहारे

Filed under: सफर की कविताएं — dipankargiri @ 8:16 अपराह्न

भाई रविंदर के आज़ाद नग़मों के लिए

हवा के सहारे टंगे हुए हैं हम
न हमसे कोई मोहबत करता है न नफरत
न कोई हमें खरीदता है
न हम किसी के हाथों बिकते हैं
हम चाहते हैं सब हमारे साथ हों
हम चाहते हैं कुछ लोग हमारे साथ न हों
कयोकि लड़ने के लिए कोई तो चाहिए
इसलिए उनकी तरफ भी कुछ लोग चाहते हैं

वे हमें जानते हैं अचछी तरह से
कि हम न क‍ांति करते हैं
न शांति से बैठते हैं
न हम रुके हुए हैं
न हम चलते हैं
हमें हर वकत उनहीं का फोन आता है
जबकि हम किसी और की आवाज़ सुनने को बेताब हैं
कभी हम अंधेरे से भागते हैं
तो कभी हम रोशनी से भागते हैं
हम चााय भी पीते हैं
हम शराब भी पीते हैं
न हम सोते हैं न जागते हैं
न हम रोते हैं न हंसते हैं
हम कभी शहर में जंगल चाहते हैं
हम कभी जंगल में शहर बसाना चाहते हैं।
हम न नियम का पालन करते हैं
न कोई नियम तोड़ते हैं
न हम पढ़ते हैं
न किताबों से दूर रहते हैं
हमें अखबारों के पनने अचछे नहीं लगते
इसलिए अखबारों को भी हम अचछे नहीं लगते
न कोई हमें बुलाता है न कोई भगाता है

हम अपने कपड़ों से कम
उनके कपडों से अधिक परेशान हैं
हम अपनी आंखों से नहीं
उनके चशमों से परेशान हैं
जब हम सूरज बन जाते है
तो उनको हमसे डर लगता है
जब हम चांद बन जाते हैं
तो वे हमें डराने लगते हैं
हम खड़े हो जाते हैं तो
उनके पांवों में ददॆ होता है
हम झुक जाते हैं तो
वे चेहरा सीधा कर घंटी बजाते हैं
वे हमारी बढ़ी हुई ढाढ़ी से खतरा सूंघते हैं
हम उनके चिकने चेहरों पर
पेड़ उगाना चाहते हैं
हम चाहतें हैं वे हमारे छत के नीचे आ जाएं
पर कैसे
हम तो खुद ही हवा में टंगे हैं
जहां ना छत है न नींव

सड़क वाले बाबा

Filed under: सफर की कविताएं — dipankargiri @ 5:51 अपराह्न

उस सड़क का नाम उस आदमी के उपर रखा गया था
जिसने किसी अंतॆराषट‍ीय सभा में
किसी धमॆ का पाठ पढ़ाया था
अब ये सड़क पढ़ाती है कि
बढ़ते हुए शहर में कैसे बढ़ना है
प‍गति के रासते पर पुराने पड़ते
प‍तीकों को कैसे मिटाना है।
महंगे इंपॊटेड हाथियों से पैदल चलते लोगों को
कैसे रीझाना है
और जिनको आता नहीं है रीझना
कैसे उनको रौंदना है
इसी सड़क के किसी किनारे पर
बाबा की दुकान है
आधुनिक प‍गति के मेले में
पुरानी ससते किताबों की दुकान है


इस दुकान में एक तरफ है धामिक किताबें
तो दूसरी तरफ हैं हिमेश रेशमिया के सुपरिहट गाने
सैकसी शायरी की किताब
अचार बनाने की विधि
सुखी जीवन के सौ उपाय
बागबानी के आसान तरीके
बाबा की उम‍ साठ के पार है
करते रहते रामाचरितमानस का पाठ हैं
हर गुजरता इंसान कुछ परेशान है
बाबा के चेहरे पर नहीं कोई तनाव है।
मैने फटाफट दस किताबें छांट ली
पूछा बाबा कितने हुए
बाबा ने कहा होते तो पचास हैं
आप चालीस दे दीजिए
मैने कहा मेरी जेब में तो बीस ही रुपये हैं
बाबा ने कहा जो है वो दे दो
और मैने बीस रुपये में दस किताबें खरीद ली
अपनी मककारी पर मैं मोगैंबो की तरह खुश हो गया
म़ुझसे पैसे लेकर बाबा किसी को
रामायण का पाठ बताने लगे कि
शूपॆनखा के भी दो बचचे थे
उसका एक पति भी था जिसे
खुद रावण ने मार दिया था।
जिसने अपना पति खोया
संतान खोयी और नाक भी खो दी
वह एक विलेन की तरह मशहूर है
बाबा दुनिया पर हंस रहे थे
मैं सोचने लगा कि
काश
शूपॆनखा का भी एक पति होता
जो भीम की तरह अपनी पतिन पर हुए
जुलम का बदला लेने का प‍ण कर पाता
लेकिन बाबा कुछ नहीं सोचते
इस शहर में जहां हर कोई दुखी हैं
बाबा सुखी हैं
बैंक में नहीं है एक रूपया भी बचा फिर भी
बाबा सुखी हैं
मैं अनायास पूछ बैठता हूं
बाबा आपका जीवन तो वयथॅ गया
बाबा मुझ पर हंसे बोले बेटा
एक जनम में मैने देखा है
बदलते हुए
गुलामी को आज़ादी में
शांति को क‍ांति में
एक जनम में कया इतना कम है
लेकिन जब आप रहेंगे नहीं चलने फिरने लायक
तो कैसे जियेंगे आप डर नहीं लगता आपको
बाबा फिर से हंसे
डर इस बात का नहीं कि
मरूंगा लाचार होकर
डर इस बात का है कि
मरना न पड़े फिर वैसे जैसे जनमा था
एक गुलाम मुलक में

सितम्बर 21, 2007

व्यंग्य मत बोलो

Filed under: सब कुछ ठीक नहीं है,Uncategorized — dipankargiri @ 12:56 अपराह्न

व्यंग्य मत बोलो
काटता है जूता तो क्या हुआ।
पैर में न सही सर पर रख डोलो
व्यंग्य मत बोलो
अंधों का साथ अगर हो जाए तो
आंखे बंद कर लो
जैसे सब टटोलते हैं
राह तुम भी टटोलो
व्यंग्य मत बोलो
क्या रखा है कुरेदने में
हर एक का चकव्यूह कुरेदने में
सत्य का निरस्त टूटा पहिया लेकर
लडने से अच्छा है
जैसी दुनिया है वैसी हो लो
व्यंग्य मत बोलो
भीतर कौन देखता है
बाहर रहो चिकने चिकने
यह मत भूलो यह बाजार है
और सभी यहां आये हैं बिकने
राम राम कहो
और माखन मिसरी घोलो
                सवेशवर दयाल सक्सेना

सितम्बर 7, 2007

राखी

Filed under: कहानी की तलाश में कुछ — dipankargiri @ 12:09 अपराह्न

पत्नि पति से :  उठिये न चलना नहीं है क्या। पति ने पत्नि को एक नजर देखा। पत्नि के गीले बालों से कुछ बूंदे पति की आंखों में पडे। पति ने पत्नि को बांहों में भर लिया। तभी फोन की घंटी बजी और पत्नि कैद से छूट कर पति को चिढाने लगी। पति ने फोन उठाया।
“भैया मैं रिंकी बोल रही हूं। आप आ रहे हैं न राखी बंधवाने “20070825rakhi12.jpg
भाई के चेहरे की मुस्कान अचानक उड गयी।

“वो वो रिंकी एकचुअली शिल्पा के भैया कल रात को ही अमेरिका से आये हैं। और तुम तो जानती ही हो कि उसके भैया छ साल के बाद आयें हैं और आज राखी का दिन भी है तो”

“भैया पर मेरे भी तो आप एक ही भाई हो।”
“कोई बात नहीं मैं अगले साल आ जाउंगा। ठीक है बाय”
पत्नि सामने आ चुकी थी।पत्नि की खूबसरती देखकर पति के हाथ से रीसीवर छूट गया।

सितम्बर 6, 2007

रात

Filed under: सफर की कविताएं — dipankargiri @ 12:23 अपराह्न

ये तपिश की रात
क्यूं नहीं उठकर चली जाती कहीं
कि पहाडों में खडा कोई पेड
हाथ तो हिलाता होगा।vladstudio_tree_and_moon_800x600.jpg
कि अपनी शाख से टूटकर कोई
पत्ता जमीं पे दफ्न तो हुआ होगा।
कि पहाडी टीले पर कोई रुमाल
अभी तक जाग तो रहा होगा।
बेचारी रात भी कितनी बेबस है
सुबह तक उसे यहीं रुकना है।

जादूगर

Filed under: सफर की कविताएं — dipankargiri @ 9:38 पूर्वाह्न

छिलते कटते चोट खाते
हाथ पांव उंगलियां फोडते
हम शहर के चौराहे पर खडे हो जाते।india_jaipur_swsw1.jpg
हर दोपहर थोडे और बडे हो जाते।
स्कूली कपडे उतारकर उस
गोल सी भीड में शामिल हो जाते।
छू मंतर से वो जादूगर
किसी के सिर से किसी का धड जोड देता।
और किसी की जेब से बटुआ उडाकर
किसी की जेब में डाल देता।
उसकी छोटी सी मुटठी में
पूरी कायनात कैद होती।
आज ढूढता हूं उस जादूगर को
शहर दर शहर
मगर वो नहीं मिलता कहीं
सोचा था कि जो खत उसने
मुझे वापस कर दिये थे
शायद मेरा जादूगर उसे
फिर से उसे दे आए।
पर सुना है अब वो ये हुनर भूल गया है।
और आंखें उसकी धुंधला गयी हैं।

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