मुसाफिर

फ़रवरी 20, 2013

निर्देशक की सामन्ती कुर्सी और लेखक का समाजवादी लैपटॉप

Filed under: Uncategorized — dipankargiri @ 1:18 अपराह्न
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बचपन में जब फुटबॉल  खेलते थे तो 15 -20 लड़कों के  बीच से उछलते फुटबाल को देखकर बस  एक ही इच्छा रहती थी कि किसी तरह एक बार फुटबाल मेरे पास  भी आ जाए। उतनी भीड़ में बाल कभी कभार  ही अपने पास आता  था लेकिन उस एक पल में फुटबॉल  को किक करने का जो रोमांच था वो  उस लड़की को देखने में भी नहीं था  जिस पर हमारा आवारा दिल आया हुआ था

कई सालों बाद कई फिल्मों की  खुजली के बाद अपनी पहली फिल्म का पहला शॉट लेते हुए कुछ वैसा ही महसूस हुआ …वो एक टॉप शॉट था जहाँ से एक शहर भागता दौड़ता अपनी पूरी रवानी में दीखता था ….”कैमरा” और “एक्शन” बोलते हुए एक लडखडाहट थी और एक पल के लिए कुछ समझ नहीं आया की मैंने क्या शूट किया ….समझ में नहीं आता था की जिस भीडभाड को मैं रोज़ देखता हूँ वो आज अचानक अलग क्यों लग रहा है ….

फिर समझ में आया कि  सिनेमा दरअसल यही है ……चीज़ों को एक नए पर्सपेक्टिव में देखना। 

मेरे लिए ये ज़रूरी नहीं था की मैं कितना अच्छा शूट करूँ …..मेरे लिए ज़रूरी था की मैं उस एक पल को महसूस कर पाया या नहीं ..अगर उस एक पल ने  मुझे फुटबॉल के उस किक का एहसास नहीं दिलाया तो मेरे लिए ये शॉट कोई मायने नहीं रखता था। ये एक लिटमस टेस्ट था और मैंने एक पल को जिया था .

लेखक अपने लैपटॉप में जो चाहे लिख सकता है …अपने सपने लिख सकता है पान खा के पचर पचर थूक सकता है ..बीडी मार ले …दोस्तों के साथ बतियाते ..उनके साथ दारु पी कर  बकचोदी कर सकता है .एक धुआं उडाती बेफिक्री होती है ..जी भर कर उलटी कर सकता है …लड़कियों को ताड़ सकता है .. ….लेकिन यही लेखक जब निर्देशक होता है तो और उन्ही दोस्तों के साथ काम कर रहा होता है तब शायद वो कोन्शस  हो जाता है।

ज़ाहिर है यूनिट में कई नए लोग होते हैं और निर्देशक को सब के साथ सामंजस्य बना कर चलना होता है। और इस तरह वो सबको अपने निर्देश देता रहता है। इस फिल्म के दौरान मैं अक्सर इस सवाल से उलझता रहा  कि निर्देशक ऐसा फ्यूडल क्यों है ….क्यों नहीं वो लेखक की तरह समाजवादी है ….?

फिर धीरे धीरे मुझे काम करते हुए ये बात समझ में आती गयी कि कुछ काम फ्यूडल तरीके से करने ही पड़ते हैं …..अपने सारे सुख वैभव छोड़कर मजदूरों के बीच काम करने वाले डॉक्टर भी एक फ्यूडल की तरह काम नहीं करेगा तो शायद मजदूरों का सही इलाज नहीं हो पाए। 

अब वो निर्देशक अपने उन्ही दोस्तों को उसे इंस्ट्रक्शन देता है जिनके साथ कल रात वो दारु पी रहा था …ये एक अजीब सी अवस्था है जिससे गुजरना लाजमी है ….

यहाँ प्रेमचंद की “पंच परमेश्वर”  की  कहानी याद आती है ….अलगू चौधरी को जब जुम्मन की खाला  जुम्मन के ही खिलाफ  पंच चुनती है तो अलगू चौधरी की मन स्थिति ऐसी ही होगी …जब वो पंच के आसन पर बैठता है तब वो जुम्मन का दोस्त नहीं रह पाता ….और उसे larger context में चीजों को देखना होता है….

जैसे आग के लिए पानी का संतुलन बना रहना चाहिए उसी तरह निर्देशक के लिए लेखक का संतुलन बने रहना चाहिए …

to be continued ….(I will write about the idea of the film ..where it came from and how i relate to it)

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फ़रवरी 15, 2013

Roshanara…must not fly

Filed under: Uncategorized — dipankargiri @ 7:25 अपराह्न

अप्रैल 30, 2011

सफेद रात

Filed under: Uncategorized — dipankargiri @ 6:38 पूर्वाह्न
पुराने शहर की इस छत पर
पूरे चांद की रात
याद आ रही है वर्षों पहले की
जंगल की एक रात

जब चांद के नीचे
जंगल पुकार रहे थे जंगलों को
और बारहसिंगे
पीछे छूट गए बारहसिंगों को
निर्जन मोड पर ऊंची झाडियों मे
ओझल होते हुए

क्या वे सब अभी तक बचे हुए हैं
पीली मिट्टी के रास्ते और खरहे
महोगनी के घने पेड
तेज महक वाली कड़ी घास
देर तक गोधूलि ओस
रखवारे की झोपड़ी और
उसके ऊपर सात तारे
पूरे चांद की इस शहरी रात में
किसलिए आ रही है याद
जंगल की रात

छत से झांकता हूं नीचे
आधी रात बिखर रही है

दूर-दूर तक चांद की रोशनी

सबसे अधिक खींचते हैं फुटपाथ
खाली खुले आधी रात के बाद के फुटपाथ
जैसे आंगन छाए रहे मुझमें बचपन से ही
और खुली छतें बुलाती रहीं रात होते ही
कहीं भी रहूं
क्या है चांद के उजाले में
इस बिखरती हुई आधी रात में
एक असहायता
जो मुझे कुचलती है और एक उम्मीद
जो तकलीफ जैसी है
शहर में इस तरह बसे
कि परिवार का टूटना ही उसकी बुनियाद हो जैसे
न पुरखे साथ आए न गांव न जंगल न जानवर
शहर में बसने का क्या मतलब है
शहर में ही खत्म हो जाना?
एक विशाल शरणार्थी शिविर के दृश्य
हर कहीं उनके भविष्यहीन तंबू
हम कैसे सफर में शामिल हैं
कि हमारी शक्ल आज भी विस्थापितों जैसी
सिर्फ कहने के लिए कोई अपना शहर है
कोई अपना घर है
इसके भीतर भी हम भटकते ही रहते हैं

लखनऊ में बहुत कम बच रहा है लखनऊ
इलाहाबाद में बहुत कम इलाहाबाद
कानपुर और बनारस और पटना और अलीगढ़
अब इन्हीं शहरों में
कई तरह की हिंसा कई तरह के बाजार
कई तरह के सौदाई
इनके भीतर इनके आसपास
इनसे बहुत दूर बम्बई हैदराबाद अमृतसर
और श्रीनगर तक
हिंसा
और हिंसा की तैयारी
और हिंसा की ताकत

बहस चल नहीं पाती
हत्याएं होती हैं
फिर जो बहस चलती है
उनका भी अंत हत्याओं में होता है
भारत में जन्म लेने का
मैं भी कोई मतलब पाना चाहता था
अब वह भारत भी नहीं रहा
जिसमें जन्म लिया

क्या है इस पूरे चांद के उजाले में
इस बिखरती हुई आधी रात में
जो मेरी सांस
लाहौर और कराची और सिंध तक उलझती है?

क्या लाहौर बच रहा है?
वह अब किस मुल्क में है?
न भारत में न पाकिस्तान में
न उर्दू में न पंजाबी में
पूछो राष्ट्रनिर्माताओं से
क्या लाहौर फिर बस पाया?

जैसे यह अछूती
आज की शाम की सफेद रात
एक सचाई है
लाहौर भी मेरी सचाई है

कहां है वह
हरे आसमान वाला शहर बगदाद
ढूंढो उसे
अब वह अरब में कहां है?

पूछो युद्ध सरदारों से
इस सफेद हो रही रात मे
क्या वे बगदाद को फिर से बना सकते हैं?

वे तो खजूर का एक पेड भी नहीं उगा सकते
वे तो रेत में उतना भी पैदल नहीं चल सकते
जितना एक बच्चा ऊंट का चलता है
ढूह और गुबार से
अंतरिक्ष की तरह खेलता हुआ

क्या वे एक ऊंट बना सकते हैं?
एक गुम्बद एक तरबूज एक ऊंची सुराही
एक सोता
जो धीरे-धीरे चश्मा बना
एक गली
जो ऊंची दीवारों के साए में शहर घूमती थी
और गली में
सिर पर फिरोजी रूमाल बांधे एक लड़की
जो फिर कभी उस गली में नहीं दिखेगी

अब उसे याद करोगे
तो वह याद आएगी
अब तुम्हारी याद ही उसका बगदाद है
तुम्हारी याद ही उसकी गली है
उसकी उम्र है
उसका फिरोजी रूमाल है

जब भगत सिंह फांसी के तख्ते की ओर बढ़े
तो अहिंसा ही थी
उनका सबसे मुश्किल सरोकार
अगर उन्हें कुबूल होता
युद्ध सरदारों का न्याय
तो वे भी जीवित रह लेते
बरदाश्त कर लेते
धीरे-धीरे उजड़ते रोज मरते हुए
लाहौर की तरह
बनारस अमुतसर लखनऊ इलाहाबाद
कानपुर और श्रीनगर की तरह

दिसम्बर 30, 2008

वेणुगोपाल जो चुपचाप चले गए

Filed under: Uncategorized — dipankargiri @ 2:50 अपराह्न

इतना तो हक बनता ही है
एक कवि का कि
जब वह मरे तो
मौत को पता हो कि
वह एक कवि को लेने जा रही है।
एक कवि मरे और कहीं एक
कविता न हो
यह तो गलत होगा
             वेणुगोपाल

जुलाई 30, 2008

सलाम

Filed under: पाश,Uncategorized — dipankargiri @ 1:28 अपराह्न

 

मैं सलाम करता हूं
आदमी के मेहनत में लगे रहने को
मैं सलाम करता हूं
आने वाले खुशगवार मौसमों को
मुसीबत से पाले गए
पयार जब सफल होंगे
बीते वकतों का बहा हुआ लहु
जिंदगी की धरती से उठा कर
मसतकों पर लगाया जाएगा
( पाश की एक कविता)

सितम्बर 21, 2007

व्यंग्य मत बोलो

Filed under: सब कुछ ठीक नहीं है,Uncategorized — dipankargiri @ 12:56 अपराह्न

व्यंग्य मत बोलो
काटता है जूता तो क्या हुआ।
पैर में न सही सर पर रख डोलो
व्यंग्य मत बोलो
अंधों का साथ अगर हो जाए तो
आंखे बंद कर लो
जैसे सब टटोलते हैं
राह तुम भी टटोलो
व्यंग्य मत बोलो
क्या रखा है कुरेदने में
हर एक का चकव्यूह कुरेदने में
सत्य का निरस्त टूटा पहिया लेकर
लडने से अच्छा है
जैसी दुनिया है वैसी हो लो
व्यंग्य मत बोलो
भीतर कौन देखता है
बाहर रहो चिकने चिकने
यह मत भूलो यह बाजार है
और सभी यहां आये हैं बिकने
राम राम कहो
और माखन मिसरी घोलो
                सवेशवर दयाल सक्सेना

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