मुसाफिर

जुलाई 29, 2008

ओतो रेने कासतीलियो की कविता

Filed under: सब कुछ ठीक नहीं है — dipankargiri @ 8:22 पूर्वाह्न

एक दिन
मेरे देश के ग़ैर राजनीतिक बुदिजीवियों से
मामूली आदमी पूछेगा
उनसे पूछा जाएगा
उनहोने तब कया किया
जब हलकी और अकेली
मीठी आग की तरह
देश दम तोड़ रहा था

कोई नहीं पूछेगा उनसे
उनकी पोशाकों के बारे में
दोपहर के भोजन के बाद
लंबी झपकी के बारे में
कोई भी जानना नहीं चाहेगा
शूनय की धारणा से उनकी
नपुंसक मुठभेड़ के बारे में
कोई चिंता नहीं करेगा
उनके उचच वितीय विदता की
उनसे नहीं पूछा जाएगा
गीक पुराणों या उस आतमघृणा के बारे में
जब उनके अंदर कोई कायर की मौत मरता है

उनसे नहीं पूछा जाएगा
सफेद झूठ की छाया में जनमे
उनके ऊलजूलूल जवाबों के बारे में

उस दिन मामूली लोग आयेंगे आगे
जिनका ग़ैर राजनीतिक बुदिजीवियों की
किताबों और कविताओं में कोई सथान नहीं है।
जो उनहें रोज़ रोटी और दूध
तोतीलिया और अंडे पहुंचाते हैं
जो उनके कपड़े सीते है
कार चलाते हैं
जो उनके कुतों और बाघों
की देखभाल करते हैं

वे पूछेंगे तब तुमने कया किया
जब ग़रीब पिस रहे थे
जब उनकी कोमलता और जीवन रीत रहे थे

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जुलाई 27, 2008

संजीव

Filed under: सब कुछ ठीक नहीं है — dipankargiri @ 5:05 अपराह्न

एक वयापक सड़ांध की बू आने लगी है। दादा, कुछ था जो निहायत ही सुंदर और संभावनाओ भरा था, मर रहा है और इसका विरोध करने वाले इस अंधी दौड़ में अलग थलग पड़ते जा रहें हैं। आपने कहा था यह लड़ाई लेखक और अफसर की है। नहीं, दादा यह लड़ाई आदमी और आदमखोर वयवसथा की है वह वयवसथा जो सता अपने हित में बुनती जा रही है। पहले आदमी बचे लेखक को फिर कभी ढूढ़ लेंगे और वह जाएगा कहां यहीं कहीं अपने बेकाबू हो गए किरदारों के पीछे भटक रहा होगा।

हमारे समय के महतवपूणॆ लेखक संजीव की किताब “पांव तले की दूब” से

सितम्बर 21, 2007

व्यंग्य मत बोलो

Filed under: सब कुछ ठीक नहीं है,Uncategorized — dipankargiri @ 12:56 अपराह्न

व्यंग्य मत बोलो
काटता है जूता तो क्या हुआ।
पैर में न सही सर पर रख डोलो
व्यंग्य मत बोलो
अंधों का साथ अगर हो जाए तो
आंखे बंद कर लो
जैसे सब टटोलते हैं
राह तुम भी टटोलो
व्यंग्य मत बोलो
क्या रखा है कुरेदने में
हर एक का चकव्यूह कुरेदने में
सत्य का निरस्त टूटा पहिया लेकर
लडने से अच्छा है
जैसी दुनिया है वैसी हो लो
व्यंग्य मत बोलो
भीतर कौन देखता है
बाहर रहो चिकने चिकने
यह मत भूलो यह बाजार है
और सभी यहां आये हैं बिकने
राम राम कहो
और माखन मिसरी घोलो
                सवेशवर दयाल सक्सेना

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