मुसाफिर

जुलाई 27, 2008

चंद अशार

(जब ग़ालिब पूछते हैं)

कोई उममीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

मौत का एक दिन मुअइयत है
नींद कयूं रात भर नहीं आती

आगे आती थी हाले दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती

 

है कुछ ऐसी बात जो चुप हूं
वरना कया बात कर नहीं आती

हम वहां हैं जहां से हमको भी
कुछ हमारी खबर नहीं आती

काबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब
शमॆ तुमको मगर नहीं आती

यूं चांद के दरवाज़े पे दसतक न दीजिए

Filed under: न रदीफ न काफिया न पाब — dipankargiri @ 5:14 अपराह्न

है नहीं मकान तो रह जाएंगे दिलों में
यूं चांद के दरवाज़े पे दसतक न दीजिए

है एक ही ज़बान सबकी आंख में
इंसान को मजहब की पहचान से न आंकिए

चढ़ चढ़ के जाइए जनाब जननतों की सीढियां
होरी किसान की मगर खबर भी लेते जाइए

जाने कितने खड़े होंगे अब भी क़तारों में
अपनी जेब के हवाले से कतार को न तोडिये

हैं दबी हुई चिंगारियां अभी भी
यूं लाश पे हमारी आप रोटियां न सेंकिये

है नहीं मकान तो रह जाएंगे दिलों में
यूं चांद के दरवाजे पे दसतक न दीजिए

बबुआ पूछेला सवाल

Filed under: न रदीफ न काफिया न पाब — dipankargiri @ 4:19 अपराह्न

मोट मोट अंखियन से पूछेला बबुआ हमार
कधिया ले धोये पड़ी होटल के गिलास

ई गिलसवा में छलकेला बचपन हमार
करलस के चोरी ऐ साथी सवनवा हमार

एको आंख सोहे न भोर कीरिनिया
सुरूजवा करेला जिनगी में हमरा अंधार

टुकुर अंखियन से ताकेली बचवन के
हमरो के सकूल चाही ऐ भाई डे‍स किताब

बड़का बुढ़वन खेलेला खेल कमाल
हमरा खेले पे लागल बा काहे घेरा हजार

हमरा मालिक के बचवन बा फूल गुलाब
हमरा माटी में काहे ना उगे फूल गुलाब

सड़किया किनारे सजल बा सुंदर बजार
फुटपाथ पर देख बचपन बिकाला हमार

केकरा से आस लगाई बताव सयान
कि जिनगी में कधिया ले आयी बिहान

मोट मोट अंखियन से पूछेला बबुआ हमार
कधिया ले धोये पड़ी होटल के गिलास

जुलाई 26, 2008

जो हाथ न उठा सके वे उंगलियां उठा बैठे

Filed under: न रदीफ न काफिया न पाब — dipankargiri @ 8:37 पूर्वाह्न

मुटठी भर राख निकली
तेरी यादों की एक रात से
कटघरे तक जा पहुंचे हम
बात निकली जब एक बात से

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