मुसाफिर

दिसम्बर 30, 2008

वेणुगोपाल जो चुपचाप चले गए

Filed under: Uncategorized — dipankargiri @ 2:50 अपराह्न

इतना तो हक बनता ही है
एक कवि का कि
जब वह मरे तो
मौत को पता हो कि
वह एक कवि को लेने जा रही है।
एक कवि मरे और कहीं एक
कविता न हो
यह तो गलत होगा
             वेणुगोपाल

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