मुसाफिर

जुलाई 25, 2008

हवा के सहारे

Filed under: सफर की कविताएं — dipankargiri @ 8:16 अपराह्न

भाई रविंदर के आज़ाद नग़मों के लिए

हवा के सहारे टंगे हुए हैं हम
न हमसे कोई मोहबत करता है न नफरत
न कोई हमें खरीदता है
न हम किसी के हाथों बिकते हैं
हम चाहते हैं सब हमारे साथ हों
हम चाहते हैं कुछ लोग हमारे साथ न हों
कयोकि लड़ने के लिए कोई तो चाहिए
इसलिए उनकी तरफ भी कुछ लोग चाहते हैं

वे हमें जानते हैं अचछी तरह से
कि हम न क‍ांति करते हैं
न शांति से बैठते हैं
न हम रुके हुए हैं
न हम चलते हैं
हमें हर वकत उनहीं का फोन आता है
जबकि हम किसी और की आवाज़ सुनने को बेताब हैं
कभी हम अंधेरे से भागते हैं
तो कभी हम रोशनी से भागते हैं
हम चााय भी पीते हैं
हम शराब भी पीते हैं
न हम सोते हैं न जागते हैं
न हम रोते हैं न हंसते हैं
हम कभी शहर में जंगल चाहते हैं
हम कभी जंगल में शहर बसाना चाहते हैं।
हम न नियम का पालन करते हैं
न कोई नियम तोड़ते हैं
न हम पढ़ते हैं
न किताबों से दूर रहते हैं
हमें अखबारों के पनने अचछे नहीं लगते
इसलिए अखबारों को भी हम अचछे नहीं लगते
न कोई हमें बुलाता है न कोई भगाता है

हम अपने कपड़ों से कम
उनके कपडों से अधिक परेशान हैं
हम अपनी आंखों से नहीं
उनके चशमों से परेशान हैं
जब हम सूरज बन जाते है
तो उनको हमसे डर लगता है
जब हम चांद बन जाते हैं
तो वे हमें डराने लगते हैं
हम खड़े हो जाते हैं तो
उनके पांवों में ददॆ होता है
हम झुक जाते हैं तो
वे चेहरा सीधा कर घंटी बजाते हैं
वे हमारी बढ़ी हुई ढाढ़ी से खतरा सूंघते हैं
हम उनके चिकने चेहरों पर
पेड़ उगाना चाहते हैं
हम चाहतें हैं वे हमारे छत के नीचे आ जाएं
पर कैसे
हम तो खुद ही हवा में टंगे हैं
जहां ना छत है न नींव

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2 टिप्पणियाँ »

  1. बढिया लिखा।आप पढने की रूची सच में बहुत कम होती जा रही है।

    जरुर पढें दिशाएं पर क्लिक करें ।

    टिप्पणी द्वारा paramjitbai — जुलाई 26, 2008 @ 5:47 पूर्वाह्न | प्रतिक्रिया

  2. excellent!while reading it i feel like as if i am actually reading about myself…”me” one of those who are actually neither here nor there…its ture that people like us are acutally nowhere…kranti ab sirf chai ke pyalon ko garm rakhne ke liye garm behson mein he milti hai…baki time to wo shopping malls ke metal detector se dar kar peeche he khadi rah jaati hai aur hum un malls mein ek commercial break ke tarah…kranti aur apne krantikari vicharon ko thoda sa pause kar dete hain….coffe shops ke kali coffe humein jeevan aur kranti ke kadvahat ke yaad to dilati hai lekin zald he usmein ghuli hue shakar ke tarah hum bhi is poonjiwadi vyavasta mein bade saral dhang se ghul jaate hain…ye kavita humari avsarvadi rajneeti ka sateek vishleshan hai…keep it up!!!

    टिप्पणी द्वारा ravinder — जुलाई 27, 2008 @ 7:24 अपराह्न | प्रतिक्रिया


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