मुसाफिर

जुलाई 25, 2008

सड़क वाले बाबा

Filed under: सफर की कविताएं — dipankargiri @ 5:51 अपराह्न

उस सड़क का नाम उस आदमी के उपर रखा गया था
जिसने किसी अंतॆराषट‍ीय सभा में
किसी धमॆ का पाठ पढ़ाया था
अब ये सड़क पढ़ाती है कि
बढ़ते हुए शहर में कैसे बढ़ना है
प‍गति के रासते पर पुराने पड़ते
प‍तीकों को कैसे मिटाना है।
महंगे इंपॊटेड हाथियों से पैदल चलते लोगों को
कैसे रीझाना है
और जिनको आता नहीं है रीझना
कैसे उनको रौंदना है
इसी सड़क के किसी किनारे पर
बाबा की दुकान है
आधुनिक प‍गति के मेले में
पुरानी ससते किताबों की दुकान है


इस दुकान में एक तरफ है धामिक किताबें
तो दूसरी तरफ हैं हिमेश रेशमिया के सुपरिहट गाने
सैकसी शायरी की किताब
अचार बनाने की विधि
सुखी जीवन के सौ उपाय
बागबानी के आसान तरीके
बाबा की उम‍ साठ के पार है
करते रहते रामाचरितमानस का पाठ हैं
हर गुजरता इंसान कुछ परेशान है
बाबा के चेहरे पर नहीं कोई तनाव है।
मैने फटाफट दस किताबें छांट ली
पूछा बाबा कितने हुए
बाबा ने कहा होते तो पचास हैं
आप चालीस दे दीजिए
मैने कहा मेरी जेब में तो बीस ही रुपये हैं
बाबा ने कहा जो है वो दे दो
और मैने बीस रुपये में दस किताबें खरीद ली
अपनी मककारी पर मैं मोगैंबो की तरह खुश हो गया
म़ुझसे पैसे लेकर बाबा किसी को
रामायण का पाठ बताने लगे कि
शूपॆनखा के भी दो बचचे थे
उसका एक पति भी था जिसे
खुद रावण ने मार दिया था।
जिसने अपना पति खोया
संतान खोयी और नाक भी खो दी
वह एक विलेन की तरह मशहूर है
बाबा दुनिया पर हंस रहे थे
मैं सोचने लगा कि
काश
शूपॆनखा का भी एक पति होता
जो भीम की तरह अपनी पतिन पर हुए
जुलम का बदला लेने का प‍ण कर पाता
लेकिन बाबा कुछ नहीं सोचते
इस शहर में जहां हर कोई दुखी हैं
बाबा सुखी हैं
बैंक में नहीं है एक रूपया भी बचा फिर भी
बाबा सुखी हैं
मैं अनायास पूछ बैठता हूं
बाबा आपका जीवन तो वयथॅ गया
बाबा मुझ पर हंसे बोले बेटा
एक जनम में मैने देखा है
बदलते हुए
गुलामी को आज़ादी में
शांति को क‍ांति में
एक जनम में कया इतना कम है
लेकिन जब आप रहेंगे नहीं चलने फिरने लायक
तो कैसे जियेंगे आप डर नहीं लगता आपको
बाबा फिर से हंसे
डर इस बात का नहीं कि
मरूंगा लाचार होकर
डर इस बात का है कि
मरना न पड़े फिर वैसे जैसे जनमा था
एक गुलाम मुलक में

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