मुसाफिर

जुलाई 30, 2008

सपने

Filed under: पाश — dipankargiri @ 1:38 अपराह्न

सपने हर किसी को नहीं आते
बेजान बारूद के कणों में
सोयी आग को सपने नहीं आते
बदी के लिए उठी हुई हथेली पर आए
पसीने को सपने नहीं आते
शैलफों में पड़े इतिहास के
गंथों को सपने नहीं आते
सपनों के लिए लाज़मी है
सहनशील दिलों का होना
सपनों के लिए नींद की नज़र होनी लाज़मी है
सपने इसलिए सभी को नहीं आते

(इस कविता का नाम नहीं दिया था पाश ने  अगर दिया होता तो शायद यही होता)

सलाम

Filed under: पाश,Uncategorized — dipankargiri @ 1:28 अपराह्न

 

मैं सलाम करता हूं
आदमी के मेहनत में लगे रहने को
मैं सलाम करता हूं
आने वाले खुशगवार मौसमों को
मुसीबत से पाले गए
पयार जब सफल होंगे
बीते वकतों का बहा हुआ लहु
जिंदगी की धरती से उठा कर
मसतकों पर लगाया जाएगा
( पाश की एक कविता)

जुलाई 29, 2008

ओतो रेने कासतीलियो की कविता

Filed under: सब कुछ ठीक नहीं है — dipankargiri @ 8:22 पूर्वाह्न

एक दिन
मेरे देश के ग़ैर राजनीतिक बुदिजीवियों से
मामूली आदमी पूछेगा
उनसे पूछा जाएगा
उनहोने तब कया किया
जब हलकी और अकेली
मीठी आग की तरह
देश दम तोड़ रहा था

कोई नहीं पूछेगा उनसे
उनकी पोशाकों के बारे में
दोपहर के भोजन के बाद
लंबी झपकी के बारे में
कोई भी जानना नहीं चाहेगा
शूनय की धारणा से उनकी
नपुंसक मुठभेड़ के बारे में
कोई चिंता नहीं करेगा
उनके उचच वितीय विदता की
उनसे नहीं पूछा जाएगा
गीक पुराणों या उस आतमघृणा के बारे में
जब उनके अंदर कोई कायर की मौत मरता है

उनसे नहीं पूछा जाएगा
सफेद झूठ की छाया में जनमे
उनके ऊलजूलूल जवाबों के बारे में

उस दिन मामूली लोग आयेंगे आगे
जिनका ग़ैर राजनीतिक बुदिजीवियों की
किताबों और कविताओं में कोई सथान नहीं है।
जो उनहें रोज़ रोटी और दूध
तोतीलिया और अंडे पहुंचाते हैं
जो उनके कपड़े सीते है
कार चलाते हैं
जो उनके कुतों और बाघों
की देखभाल करते हैं

वे पूछेंगे तब तुमने कया किया
जब ग़रीब पिस रहे थे
जब उनकी कोमलता और जीवन रीत रहे थे

जुलाई 27, 2008

चंद अशार

(जब ग़ालिब पूछते हैं)

कोई उममीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

मौत का एक दिन मुअइयत है
नींद कयूं रात भर नहीं आती

आगे आती थी हाले दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती

 

है कुछ ऐसी बात जो चुप हूं
वरना कया बात कर नहीं आती

हम वहां हैं जहां से हमको भी
कुछ हमारी खबर नहीं आती

काबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब
शमॆ तुमको मगर नहीं आती

यूं चांद के दरवाज़े पे दसतक न दीजिए

Filed under: न रदीफ न काफिया न पाब — dipankargiri @ 5:14 अपराह्न

है नहीं मकान तो रह जाएंगे दिलों में
यूं चांद के दरवाज़े पे दसतक न दीजिए

है एक ही ज़बान सबकी आंख में
इंसान को मजहब की पहचान से न आंकिए

चढ़ चढ़ के जाइए जनाब जननतों की सीढियां
होरी किसान की मगर खबर भी लेते जाइए

जाने कितने खड़े होंगे अब भी क़तारों में
अपनी जेब के हवाले से कतार को न तोडिये

हैं दबी हुई चिंगारियां अभी भी
यूं लाश पे हमारी आप रोटियां न सेंकिये

है नहीं मकान तो रह जाएंगे दिलों में
यूं चांद के दरवाजे पे दसतक न दीजिए

संजीव

Filed under: सब कुछ ठीक नहीं है — dipankargiri @ 5:05 अपराह्न

एक वयापक सड़ांध की बू आने लगी है। दादा, कुछ था जो निहायत ही सुंदर और संभावनाओ भरा था, मर रहा है और इसका विरोध करने वाले इस अंधी दौड़ में अलग थलग पड़ते जा रहें हैं। आपने कहा था यह लड़ाई लेखक और अफसर की है। नहीं, दादा यह लड़ाई आदमी और आदमखोर वयवसथा की है वह वयवसथा जो सता अपने हित में बुनती जा रही है। पहले आदमी बचे लेखक को फिर कभी ढूढ़ लेंगे और वह जाएगा कहां यहीं कहीं अपने बेकाबू हो गए किरदारों के पीछे भटक रहा होगा।

हमारे समय के महतवपूणॆ लेखक संजीव की किताब “पांव तले की दूब” से

बबुआ पूछेला सवाल

Filed under: न रदीफ न काफिया न पाब — dipankargiri @ 4:19 अपराह्न

मोट मोट अंखियन से पूछेला बबुआ हमार
कधिया ले धोये पड़ी होटल के गिलास

ई गिलसवा में छलकेला बचपन हमार
करलस के चोरी ऐ साथी सवनवा हमार

एको आंख सोहे न भोर कीरिनिया
सुरूजवा करेला जिनगी में हमरा अंधार

टुकुर अंखियन से ताकेली बचवन के
हमरो के सकूल चाही ऐ भाई डे‍स किताब

बड़का बुढ़वन खेलेला खेल कमाल
हमरा खेले पे लागल बा काहे घेरा हजार

हमरा मालिक के बचवन बा फूल गुलाब
हमरा माटी में काहे ना उगे फूल गुलाब

सड़किया किनारे सजल बा सुंदर बजार
फुटपाथ पर देख बचपन बिकाला हमार

केकरा से आस लगाई बताव सयान
कि जिनगी में कधिया ले आयी बिहान

मोट मोट अंखियन से पूछेला बबुआ हमार
कधिया ले धोये पड़ी होटल के गिलास

जुलाई 26, 2008

जो हाथ न उठा सके वे उंगलियां उठा बैठे

Filed under: न रदीफ न काफिया न पाब — dipankargiri @ 8:37 पूर्वाह्न

मुटठी भर राख निकली
तेरी यादों की एक रात से
कटघरे तक जा पहुंचे हम
बात निकली जब एक बात से

हम दोनो

Filed under: सफर की कविताएं — dipankargiri @ 8:00 पूर्वाह्न

उन संबंधों के नाम जो अब नहीं सताती

 

बिजली के खंभों की तरह
खड़े थे हम दोनो
दूर से एक दूसरे को देखते
और लोगों को लगता कि
बेज़ान हैं हम दोनो
इतने पास होकर भी
कभी गले न मिल पाये हम दोनो

तुमहें चाहिए था एक आइना
तुमहारी खूबसूरती के लिए
जबकि मैं भटकता रहा
महज एक बतॆन के लिए
रोटी और चांद की लड़ाई में
ऐसे गुम हुए हम  कि
गले न मिल पाये हम दोनो

मेरे पांव सरपट भागते थे
खेतों की मेंडों पर
जबकि तुमहें मोच आ जाती थी
उनहीं पगडंडियों पर
हाथ पकड़ कर साथ साथ
कहां तक चल पाते हम दोनो
गले न मिल पाये हम दोनो

मैं उस हवा को चूमना चाहता था
जो तुमहारे जुलफों को उड़ाती थी
तुम परेशान थी उनहीं झोंको से
और उसे मुटठी में कैद करना चाहती थी
हवा का शोर था इतना कि
सुन न पाये कुछ हम दोनो
गले न मिल पाये हम दोनो

तुमने बस इक बार जि़द की
और खिलौनों की तरह तुमहें मिला सूरज
मैं कितनी डालियां चढता रहा तब कहीं
नीम के दरखतों से छनकर मुझे मिला सूरज


था हमारे बीच ही कहीं सूरज
और भटकते रहे अंधेरे में हम दोनो

ठीक उसी वकत

Filed under: सफर की कविताएं — dipankargiri @ 6:44 पूर्वाह्न

अनु के लिए जो आज भी मुसकुराती होगी

 

ठीक उसी वकत
देखना चाहता हूं तुमहें ठीक उसी वकत
न आगे न पीछे ठीक उसी वकत
जब तुम होती हो न अपने पास न खुद से दूर
छिपकर देखना चाहता हूं तुमहें ठीक उसी वकत

उंगलियों से निशानी नापते
जब तुम घुमाती हो अपनी गले की चेन
चुपके चुपके जब पढ़ रही होती हो
अपने हाथ की लकीर
सुबह सुबह खिड़की खोलते ही जब ओढ़ लेती हो सूरज
देखना चाहता हूं तुमहें ठीक उसी वकत

कुछ बड़ी छोटी बूंदे जब
अचानक तुमहारी आंखों से टपक जाते हैं
डर जाती हो जब अपनी ही परछाई से अचानक
गिर पड़ता है चेहरे पर तुमहारे कोई बाल
काजल लगाते वकत अचानक
देखना चाहता हूं तुमहें ठीक उसी वकत

और कभी वैसा हुआ तो
जैसे अलमारी खोली हो तुमने
और अचानक से कोई पुराना खिलौना तुम पर आ गिरे
उफ नाराज़ हो रही होती हो या बस मुसकुरा देती हो
देखना चाहता हूं ठीक उसी वकत

बिसतर पर लेटी तुम
जब पढ़ रही होती हो पनने
और खो जाती हो रूपा के किरदार में
और अचानक से कालबेल की आवाज़ से
किस कदर सहम जाती हो तुम
देखना चाहता हूं तुमहें ठीक उसी वकत

गुनगुनाती हुई जब तुम काट रही होती हो सबिजयां
और अचानक से गुम हो जाती होगी बिजली
लुढकने लगते होंगे जब आलू पयाज किचन में
किस कदर बेबस हो जाती होगी तुम
देखना चाहता हूं तुमहें ठीक उसी वकत

बालकनी के सामने हिलती टहनी को
भूत समझ कर
आहिसता से जब तुम बंद करती होगी खिड़की
देखना चाहता हूं ठीक उसी वकत

उस तरह नहीं जैसे तुमहें सब देखते हैं
उस तरह भी नहीं जैसे तुम देखती हो
कोई नहीं देख रहा हो तुमहें
देखना चाहता हूं तुमहें ठीक उसी वकत

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