मुसाफिर

सितम्बर 21, 2007

व्यंग्य मत बोलो

Filed under: सब कुछ ठीक नहीं है,Uncategorized — dipankargiri @ 12:56 अपराह्न

व्यंग्य मत बोलो
काटता है जूता तो क्या हुआ।
पैर में न सही सर पर रख डोलो
व्यंग्य मत बोलो
अंधों का साथ अगर हो जाए तो
आंखे बंद कर लो
जैसे सब टटोलते हैं
राह तुम भी टटोलो
व्यंग्य मत बोलो
क्या रखा है कुरेदने में
हर एक का चकव्यूह कुरेदने में
सत्य का निरस्त टूटा पहिया लेकर
लडने से अच्छा है
जैसी दुनिया है वैसी हो लो
व्यंग्य मत बोलो
भीतर कौन देखता है
बाहर रहो चिकने चिकने
यह मत भूलो यह बाजार है
और सभी यहां आये हैं बिकने
राम राम कहो
और माखन मिसरी घोलो
                सवेशवर दयाल सक्सेना

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सितम्बर 7, 2007

राखी

Filed under: कहानी की तलाश में कुछ — dipankargiri @ 12:09 अपराह्न

पत्नि पति से :  उठिये न चलना नहीं है क्या। पति ने पत्नि को एक नजर देखा। पत्नि के गीले बालों से कुछ बूंदे पति की आंखों में पडे। पति ने पत्नि को बांहों में भर लिया। तभी फोन की घंटी बजी और पत्नि कैद से छूट कर पति को चिढाने लगी। पति ने फोन उठाया।
“भैया मैं रिंकी बोल रही हूं। आप आ रहे हैं न राखी बंधवाने “20070825rakhi12.jpg
भाई के चेहरे की मुस्कान अचानक उड गयी।

“वो वो रिंकी एकचुअली शिल्पा के भैया कल रात को ही अमेरिका से आये हैं। और तुम तो जानती ही हो कि उसके भैया छ साल के बाद आयें हैं और आज राखी का दिन भी है तो”

“भैया पर मेरे भी तो आप एक ही भाई हो।”
“कोई बात नहीं मैं अगले साल आ जाउंगा। ठीक है बाय”
पत्नि सामने आ चुकी थी।पत्नि की खूबसरती देखकर पति के हाथ से रीसीवर छूट गया।

सितम्बर 6, 2007

रात

Filed under: सफर की कविताएं — dipankargiri @ 12:23 अपराह्न

ये तपिश की रात
क्यूं नहीं उठकर चली जाती कहीं
कि पहाडों में खडा कोई पेड
हाथ तो हिलाता होगा।vladstudio_tree_and_moon_800x600.jpg
कि अपनी शाख से टूटकर कोई
पत्ता जमीं पे दफ्न तो हुआ होगा।
कि पहाडी टीले पर कोई रुमाल
अभी तक जाग तो रहा होगा।
बेचारी रात भी कितनी बेबस है
सुबह तक उसे यहीं रुकना है।

जादूगर

Filed under: सफर की कविताएं — dipankargiri @ 9:38 पूर्वाह्न

छिलते कटते चोट खाते
हाथ पांव उंगलियां फोडते
हम शहर के चौराहे पर खडे हो जाते।india_jaipur_swsw1.jpg
हर दोपहर थोडे और बडे हो जाते।
स्कूली कपडे उतारकर उस
गोल सी भीड में शामिल हो जाते।
छू मंतर से वो जादूगर
किसी के सिर से किसी का धड जोड देता।
और किसी की जेब से बटुआ उडाकर
किसी की जेब में डाल देता।
उसकी छोटी सी मुटठी में
पूरी कायनात कैद होती।
आज ढूढता हूं उस जादूगर को
शहर दर शहर
मगर वो नहीं मिलता कहीं
सोचा था कि जो खत उसने
मुझे वापस कर दिये थे
शायद मेरा जादूगर उसे
फिर से उसे दे आए।
पर सुना है अब वो ये हुनर भूल गया है।
और आंखें उसकी धुंधला गयी हैं।

सितम्बर 5, 2007

तुम क्या जानो

Filed under: सफर की कविताएं — dipankargiri @ 11:37 पूर्वाह्न

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तुम क्या जानो कैसे सजती है
बूंदों की महफिल।
तुम क्या जानो सीप से कैसे
मिलती हैं बूंदे।
मिटटी के रेले में
कैसे बह जाते हैंrain54352.jpg
सूखे रेत को टीले।
धुल जाती है कैसे
चपटी रेल की पटरियां।
पत्तों की छुअन से कैसे
लजा जाती हैं बूंदें।
शाखें अपनी मस्ती में
झूलने लगती हैं झूले।

तुम तो बस जरा सी बारिश से
घबराकर बंद कर लेती हो दरवाजे।
छींटों से बचने की खातिर
बंद कर लेती हो खिडकियां
और फशॆ पर सजा देती हो
पायदानों के गुलदस्ते
संभल संभल कर चलती हो
कि कहीं फिसल न जाए पांव
कोई मजदूर लगती हो ढूढने जब
दीवारों में पडते सीलन से हो जाती हो परेशान
इतना सब करने को बाद भी
तुम रहती हो बेवजह परेशान।

कभी यूं ही

Filed under: मेरा सफर — dipankargiri @ 11:30 पूर्वाह्न

800px-rail_tracks_and_signal.jpgफुसॆत कभी मिली नहीं।

 जब बच्चे थे तब भी नहीं।

यूं कि खेलकूद में सारा दिन बीत जाता।

थोड़े बडे हुए तो किताबों ने खाली लम्हों को छीन लिया।

जब दुनिया समझने लगे तो और थोडा और समझने के फेर में वक्त बीत गया।

फिर तो बस जिन्दगी ने जो रफ्तार पकडी कि बस चलते चले गये। 7950037_1d0b413fa9_b.jpg

गुलजार के गीत दिल ढूढता है से थोडी तसल्ली मिल जाती है पर असल में फुसॆत कभी नहीं मिली।

थक हार कर बंटी बबली से एक शहर फुसॆतगंज किराये पर ले ली। आजकल मैं यहीं रहता हूं
बिल्कुल फुसॆत में।

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