मुसाफिर

September 5, 2007

कभी यूं ही

Filed under: मेरा सफर — dipankargiri @ 11:30 am

800px-rail_tracks_and_signal.jpgफुसॆत कभी मिली नहीं।

 जब बच्चे थे तब भी नहीं।

यूं कि खेलकूद में सारा दिन बीत जाता।

थोड़े बडे हुए तो किताबों ने खाली लम्हों को छीन लिया।

जब दुनिया समझने लगे तो और थोडा और समझने के फेर में वक्त बीत गया।

फिर तो बस जिन्दगी ने जो रफ्तार पकडी कि बस चलते चले गये। 7950037_1d0b413fa9_b.jpg

गुलजार के गीत दिल ढूढता है से थोडी तसल्ली मिल जाती है पर असल में फुसॆत कभी नहीं मिली।

थक हार कर बंटी बबली से एक शहर फुसॆतगंज किराये पर ले ली। आजकल मैं यहीं रहता हूं
बिल्कुल फुसॆत में।

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