मुसाफिर

July 30, 2008

सपने

Filed under: पाश — dipankargiri @ 1:38 pm

सपने हर किसी को नहीं आते
बेजान बारूद के कणों में
सोयी आग को सपने नहीं आते
बदी के लिए उठी हुई हथेली पर आए
पसीने को सपने नहीं आते
शैलफों में पड़े इतिहास के
गंथों को सपने नहीं आते
सपनों के लिए लाज़मी है
सहनशील दिलों का होना
सपनों के लिए नींद की नज़र होनी लाज़मी है
सपने इसलिए सभी को नहीं आते

(इस कविता का नाम नहीं दिया था पाश ने  अगर दिया होता तो शायद यही होता)

सलाम

Filed under: पाश — dipankargiri @ 1:28 pm

 

मैं सलाम करता हूं
आदमी के मेहनत में लगे रहने को
मैं सलाम करता हूं
आने वाले खुशगवार मौसमों को
मुसीबत से पाले गए
पयार जब सफल होंगे
बीते वकतों का बहा हुआ लहु
जिंदगी की धरती से उठा कर
मसतकों पर लगाया जाएगा
( पाश की एक कविता)

Blog at WordPress.com.