मुसाफिर

सितम्बर 7, 2007

राखी

Filed under: कहानी की तलाश में कुछ — dipankargiri @ 12:09 अपराह्न

पत्नि पति से :  उठिये न चलना नहीं है क्या। पति ने पत्नि को एक नजर देखा। पत्नि के गीले बालों से कुछ बूंदे पति की आंखों में पडे। पति ने पत्नि को बांहों में भर लिया। तभी फोन की घंटी बजी और पत्नि कैद से छूट कर पति को चिढाने लगी। पति ने फोन उठाया।
“भैया मैं रिंकी बोल रही हूं। आप आ रहे हैं न राखी बंधवाने “20070825rakhi12.jpg
भाई के चेहरे की मुस्कान अचानक उड गयी।

“वो वो रिंकी एकचुअली शिल्पा के भैया कल रात को ही अमेरिका से आये हैं। और तुम तो जानती ही हो कि उसके भैया छ साल के बाद आयें हैं और आज राखी का दिन भी है तो”

“भैया पर मेरे भी तो आप एक ही भाई हो।”
“कोई बात नहीं मैं अगले साल आ जाउंगा। ठीक है बाय”
पत्नि सामने आ चुकी थी।पत्नि की खूबसरती देखकर पति के हाथ से रीसीवर छूट गया।

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