है नहीं मकान तो रह जाएंगे दिलों में
यूं चांद के दरवाज़े पे दसतक न दीजिए
है एक ही ज़बान सबकी आंख में
इंसान को मजहब की पहचान से न आंकिए
चढ़ चढ़ के जाइए जनाब जननतों की सीढियां
होरी किसान की मगर खबर भी लेते जाइए
जाने कितने खड़े होंगे अब भी क़तारों में
अपनी जेब के हवाले से कतार को न तोडिये
हैं दबी हुई चिंगारियां अभी भी
यूं लाश पे हमारी आप रोटियां न सेंकिये
है नहीं मकान तो रह जाएंगे दिलों में
यूं चांद के दरवाजे पे दसतक न दीजिए