(जब ग़ालिब पूछते हैं)
कोई उममीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मुअइयत है
नींद कयूं रात भर नहीं आती
आगे आती थी हाले दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती
है कुछ ऐसी बात जो चुप हूं
वरना कया बात कर नहीं आती
हम वहां हैं जहां से हमको भी
कुछ हमारी खबर नहीं आती
काबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब
शमॆ तुमको मगर नहीं आती