मुसाफिर

July 26, 2008

हम दोनो

Filed under: सफर की कविताएं — dipankargiri @ 8:00 am

उन संबंधों के नाम जो अब नहीं सताती

 

बिजली के खंभों की तरह
खड़े थे हम दोनो
दूर से एक दूसरे को देखते
और लोगों को लगता कि
बेज़ान हैं हम दोनो
इतने पास होकर भी
कभी गले न मिल पाये हम दोनो

तुमहें चाहिए था एक आइना
तुमहारी खूबसूरती के लिए
जबकि मैं भटकता रहा
महज एक बतॆन के लिए
रोटी और चांद की लड़ाई में
ऐसे गुम हुए हम  कि
गले न मिल पाये हम दोनो

मेरे पांव सरपट भागते थे
खेतों की मेंडों पर
जबकि तुमहें मोच आ जाती थी
उनहीं पगडंडियों पर
हाथ पकड़ कर साथ साथ
कहां तक चल पाते हम दोनो
गले न मिल पाये हम दोनो

मैं उस हवा को चूमना चाहता था
जो तुमहारे जुलफों को उड़ाती थी
तुम परेशान थी उनहीं झोंको से
और उसे मुटठी में कैद करना चाहती थी
हवा का शोर था इतना कि
सुन न पाये कुछ हम दोनो
गले न मिल पाये हम दोनो

तुमने बस इक बार जि़द की
और खिलौनों की तरह तुमहें मिला सूरज
मैं कितनी डालियां चढता रहा तब कहीं
नीम के दरखतों से छनकर मुझे मिला सूरज


था हमारे बीच ही कहीं सूरज
और भटकते रहे अंधेरे में हम दोनो

1 Comment »

  1. waah.. sunder kavita
    नए ब्लॉग की बधाई, बहुत सुंदर और सराहनीय प्रयास है आपका, हिन्दी चिट्टा जगत में आपका स्वागत है, सक्रिय लेखन कर हिन्दी को समृद्ध करें, शुभकामनाओ सहित
    आपका मित्र -

    सजीव सारथी
    09871123997
    http://www.podcast.hindyugm.com

    Comment by sajeev sarathie — July 27, 2008 @ 8:05 am | Reply


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