मुसाफिर

अप्रैल 30, 2011

सफेद रात

Filed under: Uncategorized — dipankargiri @ 6:38 पूर्वाह्न
पुराने शहर की इस छत पर
पूरे चांद की रात
याद आ रही है वर्षों पहले की
जंगल की एक रात

जब चांद के नीचे
जंगल पुकार रहे थे जंगलों को
और बारहसिंगे
पीछे छूट गए बारहसिंगों को
निर्जन मोड पर ऊंची झाडियों मे
ओझल होते हुए

क्या वे सब अभी तक बचे हुए हैं
पीली मिट्टी के रास्ते और खरहे
महोगनी के घने पेड
तेज महक वाली कड़ी घास
देर तक गोधूलि ओस
रखवारे की झोपड़ी और
उसके ऊपर सात तारे
पूरे चांद की इस शहरी रात में
किसलिए आ रही है याद
जंगल की रात

छत से झांकता हूं नीचे
आधी रात बिखर रही है

दूर-दूर तक चांद की रोशनी

सबसे अधिक खींचते हैं फुटपाथ
खाली खुले आधी रात के बाद के फुटपाथ
जैसे आंगन छाए रहे मुझमें बचपन से ही
और खुली छतें बुलाती रहीं रात होते ही
कहीं भी रहूं
क्या है चांद के उजाले में
इस बिखरती हुई आधी रात में
एक असहायता
जो मुझे कुचलती है और एक उम्मीद
जो तकलीफ जैसी है
शहर में इस तरह बसे
कि परिवार का टूटना ही उसकी बुनियाद हो जैसे
न पुरखे साथ आए न गांव न जंगल न जानवर
शहर में बसने का क्या मतलब है
शहर में ही खत्म हो जाना?
एक विशाल शरणार्थी शिविर के दृश्य
हर कहीं उनके भविष्यहीन तंबू
हम कैसे सफर में शामिल हैं
कि हमारी शक्ल आज भी विस्थापितों जैसी
सिर्फ कहने के लिए कोई अपना शहर है
कोई अपना घर है
इसके भीतर भी हम भटकते ही रहते हैं

लखनऊ में बहुत कम बच रहा है लखनऊ
इलाहाबाद में बहुत कम इलाहाबाद
कानपुर और बनारस और पटना और अलीगढ़
अब इन्हीं शहरों में
कई तरह की हिंसा कई तरह के बाजार
कई तरह के सौदाई
इनके भीतर इनके आसपास
इनसे बहुत दूर बम्बई हैदराबाद अमृतसर
और श्रीनगर तक
हिंसा
और हिंसा की तैयारी
और हिंसा की ताकत

बहस चल नहीं पाती
हत्याएं होती हैं
फिर जो बहस चलती है
उनका भी अंत हत्याओं में होता है
भारत में जन्म लेने का
मैं भी कोई मतलब पाना चाहता था
अब वह भारत भी नहीं रहा
जिसमें जन्म लिया

क्या है इस पूरे चांद के उजाले में
इस बिखरती हुई आधी रात में
जो मेरी सांस
लाहौर और कराची और सिंध तक उलझती है?

क्या लाहौर बच रहा है?
वह अब किस मुल्क में है?
न भारत में न पाकिस्तान में
न उर्दू में न पंजाबी में
पूछो राष्ट्रनिर्माताओं से
क्या लाहौर फिर बस पाया?

जैसे यह अछूती
आज की शाम की सफेद रात
एक सचाई है
लाहौर भी मेरी सचाई है

कहां है वह
हरे आसमान वाला शहर बगदाद
ढूंढो उसे
अब वह अरब में कहां है?

पूछो युद्ध सरदारों से
इस सफेद हो रही रात मे
क्या वे बगदाद को फिर से बना सकते हैं?

वे तो खजूर का एक पेड भी नहीं उगा सकते
वे तो रेत में उतना भी पैदल नहीं चल सकते
जितना एक बच्चा ऊंट का चलता है
ढूह और गुबार से
अंतरिक्ष की तरह खेलता हुआ

क्या वे एक ऊंट बना सकते हैं?
एक गुम्बद एक तरबूज एक ऊंची सुराही
एक सोता
जो धीरे-धीरे चश्मा बना
एक गली
जो ऊंची दीवारों के साए में शहर घूमती थी
और गली में
सिर पर फिरोजी रूमाल बांधे एक लड़की
जो फिर कभी उस गली में नहीं दिखेगी

अब उसे याद करोगे
तो वह याद आएगी
अब तुम्हारी याद ही उसका बगदाद है
तुम्हारी याद ही उसकी गली है
उसकी उम्र है
उसका फिरोजी रूमाल है

जब भगत सिंह फांसी के तख्ते की ओर बढ़े
तो अहिंसा ही थी
उनका सबसे मुश्किल सरोकार
अगर उन्हें कुबूल होता
युद्ध सरदारों का न्याय
तो वे भी जीवित रह लेते
बरदाश्त कर लेते
धीरे-धीरे उजड़ते रोज मरते हुए
लाहौर की तरह
बनारस अमुतसर लखनऊ इलाहाबाद
कानपुर और श्रीनगर की तरह

दिसम्बर 30, 2008

वेणुगोपाल जो चुपचाप चले गए

Filed under: Uncategorized — dipankargiri @ 2:50 अपराह्न

इतना तो हक बनता ही है
एक कवि का कि
जब वह मरे तो
मौत को पता हो कि
वह एक कवि को लेने जा रही है।
एक कवि मरे और कहीं एक
कविता न हो
यह तो गलत होगा
             वेणुगोपाल

जुलाई 30, 2008

सपने

Filed under: पाश — dipankargiri @ 1:38 अपराह्न

सपने हर किसी को नहीं आते
बेजान बारूद के कणों में
सोयी आग को सपने नहीं आते
बदी के लिए उठी हुई हथेली पर आए
पसीने को सपने नहीं आते
शैलफों में पड़े इतिहास के
गंथों को सपने नहीं आते
सपनों के लिए लाज़मी है
सहनशील दिलों का होना
सपनों के लिए नींद की नज़र होनी लाज़मी है
सपने इसलिए सभी को नहीं आते

(इस कविता का नाम नहीं दिया था पाश ने  अगर दिया होता तो शायद यही होता)

सलाम

Filed under: पाश,Uncategorized — dipankargiri @ 1:28 अपराह्न

 

मैं सलाम करता हूं
आदमी के मेहनत में लगे रहने को
मैं सलाम करता हूं
आने वाले खुशगवार मौसमों को
मुसीबत से पाले गए
पयार जब सफल होंगे
बीते वकतों का बहा हुआ लहु
जिंदगी की धरती से उठा कर
मसतकों पर लगाया जाएगा
( पाश की एक कविता)

जुलाई 29, 2008

ओतो रेने कासतीलियो की कविता

Filed under: सब कुछ ठीक नहीं है — dipankargiri @ 8:22 पूर्वाह्न

एक दिन
मेरे देश के ग़ैर राजनीतिक बुदिजीवियों से
मामूली आदमी पूछेगा
उनसे पूछा जाएगा
उनहोने तब कया किया
जब हलकी और अकेली
मीठी आग की तरह
देश दम तोड़ रहा था

कोई नहीं पूछेगा उनसे
उनकी पोशाकों के बारे में
दोपहर के भोजन के बाद
लंबी झपकी के बारे में
कोई भी जानना नहीं चाहेगा
शूनय की धारणा से उनकी
नपुंसक मुठभेड़ के बारे में
कोई चिंता नहीं करेगा
उनके उचच वितीय विदता की
उनसे नहीं पूछा जाएगा
गीक पुराणों या उस आतमघृणा के बारे में
जब उनके अंदर कोई कायर की मौत मरता है

उनसे नहीं पूछा जाएगा
सफेद झूठ की छाया में जनमे
उनके ऊलजूलूल जवाबों के बारे में

उस दिन मामूली लोग आयेंगे आगे
जिनका ग़ैर राजनीतिक बुदिजीवियों की
किताबों और कविताओं में कोई सथान नहीं है।
जो उनहें रोज़ रोटी और दूध
तोतीलिया और अंडे पहुंचाते हैं
जो उनके कपड़े सीते है
कार चलाते हैं
जो उनके कुतों और बाघों
की देखभाल करते हैं

वे पूछेंगे तब तुमने कया किया
जब ग़रीब पिस रहे थे
जब उनकी कोमलता और जीवन रीत रहे थे

जुलाई 27, 2008

चंद अशार

(जब ग़ालिब पूछते हैं)

कोई उममीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

मौत का एक दिन मुअइयत है
नींद कयूं रात भर नहीं आती

आगे आती थी हाले दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती

 

है कुछ ऐसी बात जो चुप हूं
वरना कया बात कर नहीं आती

हम वहां हैं जहां से हमको भी
कुछ हमारी खबर नहीं आती

काबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब
शमॆ तुमको मगर नहीं आती

यूं चांद के दरवाज़े पे दसतक न दीजिए

Filed under: न रदीफ न काफिया न पाब — dipankargiri @ 5:14 अपराह्न

है नहीं मकान तो रह जाएंगे दिलों में
यूं चांद के दरवाज़े पे दसतक न दीजिए

है एक ही ज़बान सबकी आंख में
इंसान को मजहब की पहचान से न आंकिए

चढ़ चढ़ के जाइए जनाब जननतों की सीढियां
होरी किसान की मगर खबर भी लेते जाइए

जाने कितने खड़े होंगे अब भी क़तारों में
अपनी जेब के हवाले से कतार को न तोडिये

हैं दबी हुई चिंगारियां अभी भी
यूं लाश पे हमारी आप रोटियां न सेंकिये

है नहीं मकान तो रह जाएंगे दिलों में
यूं चांद के दरवाजे पे दसतक न दीजिए

संजीव

Filed under: सब कुछ ठीक नहीं है — dipankargiri @ 5:05 अपराह्न

एक वयापक सड़ांध की बू आने लगी है। दादा, कुछ था जो निहायत ही सुंदर और संभावनाओ भरा था, मर रहा है और इसका विरोध करने वाले इस अंधी दौड़ में अलग थलग पड़ते जा रहें हैं। आपने कहा था यह लड़ाई लेखक और अफसर की है। नहीं, दादा यह लड़ाई आदमी और आदमखोर वयवसथा की है वह वयवसथा जो सता अपने हित में बुनती जा रही है। पहले आदमी बचे लेखक को फिर कभी ढूढ़ लेंगे और वह जाएगा कहां यहीं कहीं अपने बेकाबू हो गए किरदारों के पीछे भटक रहा होगा।

हमारे समय के महतवपूणॆ लेखक संजीव की किताब “पांव तले की दूब” से

बबुआ पूछेला सवाल

Filed under: न रदीफ न काफिया न पाब — dipankargiri @ 4:19 अपराह्न

मोट मोट अंखियन से पूछेला बबुआ हमार
कधिया ले धोये पड़ी होटल के गिलास

ई गिलसवा में छलकेला बचपन हमार
करलस के चोरी ऐ साथी सवनवा हमार

एको आंख सोहे न भोर कीरिनिया
सुरूजवा करेला जिनगी में हमरा अंधार

टुकुर अंखियन से ताकेली बचवन के
हमरो के सकूल चाही ऐ भाई डे‍स किताब

बड़का बुढ़वन खेलेला खेल कमाल
हमरा खेले पे लागल बा काहे घेरा हजार

हमरा मालिक के बचवन बा फूल गुलाब
हमरा माटी में काहे ना उगे फूल गुलाब

सड़किया किनारे सजल बा सुंदर बजार
फुटपाथ पर देख बचपन बिकाला हमार

केकरा से आस लगाई बताव सयान
कि जिनगी में कधिया ले आयी बिहान

मोट मोट अंखियन से पूछेला बबुआ हमार
कधिया ले धोये पड़ी होटल के गिलास

जुलाई 26, 2008

जो हाथ न उठा सके वे उंगलियां उठा बैठे

Filed under: न रदीफ न काफिया न पाब — dipankargiri @ 8:37 पूर्वाह्न

मुटठी भर राख निकली
तेरी यादों की एक रात से
कटघरे तक जा पहुंचे हम
बात निकली जब एक बात से

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