मुसाफिर

December 30, 2008

वेणुगोपाल जो चुपचाप चले गए

Filed under: Uncategorized — dipankargiri @ 2:50 pm

इतना तो हक बनता ही है
एक कवि का कि
जब वह मरे तो
मौत को पता हो कि
वह एक कवि को लेने जा रही है।
एक कवि मरे और कहीं एक
कविता न हो
यह तो गलत होगा
             वेणुगोपाल

July 30, 2008

सपने

Filed under: पाश — dipankargiri @ 1:38 pm

सपने हर किसी को नहीं आते
बेजान बारूद के कणों में
सोयी आग को सपने नहीं आते
बदी के लिए उठी हुई हथेली पर आए
पसीने को सपने नहीं आते
शैलफों में पड़े इतिहास के
गंथों को सपने नहीं आते
सपनों के लिए लाज़मी है
सहनशील दिलों का होना
सपनों के लिए नींद की नज़र होनी लाज़मी है
सपने इसलिए सभी को नहीं आते

(इस कविता का नाम नहीं दिया था पाश ने  अगर दिया होता तो शायद यही होता)

सलाम

Filed under: पाश — dipankargiri @ 1:28 pm

 

मैं सलाम करता हूं
आदमी के मेहनत में लगे रहने को
मैं सलाम करता हूं
आने वाले खुशगवार मौसमों को
मुसीबत से पाले गए
पयार जब सफल होंगे
बीते वकतों का बहा हुआ लहु
जिंदगी की धरती से उठा कर
मसतकों पर लगाया जाएगा
( पाश की एक कविता)

July 29, 2008

ओतो रेने कासतीलियो की कविता

Filed under: सब कुछ ठीक नहीं है — dipankargiri @ 8:22 am

एक दिन
मेरे देश के ग़ैर राजनीतिक बुदिजीवियों से
मामूली आदमी पूछेगा
उनसे पूछा जाएगा
उनहोने तब कया किया
जब हलकी और अकेली
मीठी आग की तरह
देश दम तोड़ रहा था

कोई नहीं पूछेगा उनसे
उनकी पोशाकों के बारे में
दोपहर के भोजन के बाद
लंबी झपकी के बारे में
कोई भी जानना नहीं चाहेगा
शूनय की धारणा से उनकी
नपुंसक मुठभेड़ के बारे में
कोई चिंता नहीं करेगा
उनके उचच वितीय विदता की
उनसे नहीं पूछा जाएगा
गीक पुराणों या उस आतमघृणा के बारे में
जब उनके अंदर कोई कायर की मौत मरता है

उनसे नहीं पूछा जाएगा
सफेद झूठ की छाया में जनमे
उनके ऊलजूलूल जवाबों के बारे में

उस दिन मामूली लोग आयेंगे आगे
जिनका ग़ैर राजनीतिक बुदिजीवियों की
किताबों और कविताओं में कोई सथान नहीं है।
जो उनहें रोज़ रोटी और दूध
तोतीलिया और अंडे पहुंचाते हैं
जो उनके कपड़े सीते है
कार चलाते हैं
जो उनके कुतों और बाघों
की देखभाल करते हैं

वे पूछेंगे तब तुमने कया किया
जब ग़रीब पिस रहे थे
जब उनकी कोमलता और जीवन रीत रहे थे

July 27, 2008

चंद अशार

(जब ग़ालिब पूछते हैं)

कोई उममीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

मौत का एक दिन मुअइयत है
नींद कयूं रात भर नहीं आती

आगे आती थी हाले दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती

 

है कुछ ऐसी बात जो चुप हूं
वरना कया बात कर नहीं आती

हम वहां हैं जहां से हमको भी
कुछ हमारी खबर नहीं आती

काबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब
शमॆ तुमको मगर नहीं आती

यूं चांद के दरवाज़े पे दसतक न दीजिए

Filed under: न रदीफ न काफिया न पाब — dipankargiri @ 5:14 pm

है नहीं मकान तो रह जाएंगे दिलों में
यूं चांद के दरवाज़े पे दसतक न दीजिए

है एक ही ज़बान सबकी आंख में
इंसान को मजहब की पहचान से न आंकिए

चढ़ चढ़ के जाइए जनाब जननतों की सीढियां
होरी किसान की मगर खबर भी लेते जाइए

जाने कितने खड़े होंगे अब भी क़तारों में
अपनी जेब के हवाले से कतार को न तोडिये

हैं दबी हुई चिंगारियां अभी भी
यूं लाश पे हमारी आप रोटियां न सेंकिये

है नहीं मकान तो रह जाएंगे दिलों में
यूं चांद के दरवाजे पे दसतक न दीजिए

संजीव

Filed under: सब कुछ ठीक नहीं है — dipankargiri @ 5:05 pm

एक वयापक सड़ांध की बू आने लगी है। दादा, कुछ था जो निहायत ही सुंदर और संभावनाओ भरा था, मर रहा है और इसका विरोध करने वाले इस अंधी दौड़ में अलग थलग पड़ते जा रहें हैं। आपने कहा था यह लड़ाई लेखक और अफसर की है। नहीं, दादा यह लड़ाई आदमी और आदमखोर वयवसथा की है वह वयवसथा जो सता अपने हित में बुनती जा रही है। पहले आदमी बचे लेखक को फिर कभी ढूढ़ लेंगे और वह जाएगा कहां यहीं कहीं अपने बेकाबू हो गए किरदारों के पीछे भटक रहा होगा।

हमारे समय के महतवपूणॆ लेखक संजीव की किताब “पांव तले की दूब” से

बबुआ पूछेला सवाल

Filed under: न रदीफ न काफिया न पाब — dipankargiri @ 4:19 pm

मोट मोट अंखियन से पूछेला बबुआ हमार
कधिया ले धोये पड़ी होटल के गिलास

ई गिलसवा में छलकेला बचपन हमार
करलस के चोरी ऐ साथी सवनवा हमार

एको आंख सोहे न भोर कीरिनिया
सुरूजवा करेला जिनगी में हमरा अंधार

टुकुर अंखियन से ताकेली बचवन के
हमरो के सकूल चाही ऐ भाई डे‍स किताब

बड़का बुढ़वन खेलेला खेल कमाल
हमरा खेले पे लागल बा काहे घेरा हजार

हमरा मालिक के बचवन बा फूल गुलाब
हमरा माटी में काहे ना उगे फूल गुलाब

सड़किया किनारे सजल बा सुंदर बजार
फुटपाथ पर देख बचपन बिकाला हमार

केकरा से आस लगाई बताव सयान
कि जिनगी में कधिया ले आयी बिहान

मोट मोट अंखियन से पूछेला बबुआ हमार
कधिया ले धोये पड़ी होटल के गिलास

July 26, 2008

जो हाथ न उठा सके वे उंगलियां उठा बैठे

Filed under: न रदीफ न काफिया न पाब — dipankargiri @ 8:37 am

मुटठी भर राख निकली
तेरी यादों की एक रात से
कटघरे तक जा पहुंचे हम
बात निकली जब एक बात से

हम दोनो

Filed under: सफर की कविताएं — dipankargiri @ 8:00 am

उन संबंधों के नाम जो अब नहीं सताती

 

बिजली के खंभों की तरह
खड़े थे हम दोनो
दूर से एक दूसरे को देखते
और लोगों को लगता कि
बेज़ान हैं हम दोनो
इतने पास होकर भी
कभी गले न मिल पाये हम दोनो

तुमहें चाहिए था एक आइना
तुमहारी खूबसूरती के लिए
जबकि मैं भटकता रहा
महज एक बतॆन के लिए
रोटी और चांद की लड़ाई में
ऐसे गुम हुए हम  कि
गले न मिल पाये हम दोनो

मेरे पांव सरपट भागते थे
खेतों की मेंडों पर
जबकि तुमहें मोच आ जाती थी
उनहीं पगडंडियों पर
हाथ पकड़ कर साथ साथ
कहां तक चल पाते हम दोनो
गले न मिल पाये हम दोनो

मैं उस हवा को चूमना चाहता था
जो तुमहारे जुलफों को उड़ाती थी
तुम परेशान थी उनहीं झोंको से
और उसे मुटठी में कैद करना चाहती थी
हवा का शोर था इतना कि
सुन न पाये कुछ हम दोनो
गले न मिल पाये हम दोनो

तुमने बस इक बार जि़द की
और खिलौनों की तरह तुमहें मिला सूरज
मैं कितनी डालियां चढता रहा तब कहीं
नीम के दरखतों से छनकर मुझे मिला सूरज


था हमारे बीच ही कहीं सूरज
और भटकते रहे अंधेरे में हम दोनो

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